(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.20. अध्यायः 020
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरंप्रति देवस्थानस्य वचनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 12-20-0x(6044)(72944)
अस्मिन्वाक्यान्तरे वक्ता देवस्थानो महातपाः।
अभिनीततरं वाक्यमित्युवाच युधिष्ठिरम्॥ 12-20-1(72945)
देवस्थान उवाच। 12-20-2x(6045)
यद्वचः फल्गुनेनोक्तं न ज्यायोऽस्ति धनादिति।
अत्र ते वर्तयिष्यामि तदेकान्तमनाः शृणु॥ 12-20-2(72946)
अजातशत्रो धर्मेण कृत्स्ना ते वसुधा जिता।
तां जित्वा च वृथा राजन्न परित्यक्तुमर्हसि॥ 12-20-3(72947)
चतुष्पदी हि निःश्रेणी ब्रह्मण्येषा प्रतिष्ठिता।
तां क्रमेण महाबाहो यथावज्जय पार्थिव।
तस्मात्पार्थ महायज्ञैर्यजस्व बहुदक्षिणैः॥ 12-20-4(72948)
स्वाध्याययज्ञा ऋषयो ज्ञानयज्ञास्तथाऽपरे।
कर्मनिष्ठाश्च बुद्ध्यर्थास्तपोनिष्ठाश्च पार्थिव॥ 12-20-5(72949)
वैखानसानां कौन्तेय वचनं श्रूयते यथा॥ 12-20-6(72950)
ईहेत धनहेतोर्यस्तस्यानीहा गरीयसी।
भूयान्दोषो हि वर्धेत यस्तत्कर्म समाश्रयेत्॥ 12-20-7(72951)
कृत्स्नं च धनसंहारं कुर्वन्ति विधिकारणात्।
आत्मना तृपितो बुद्ध्या भ्रूणहत्यां न बुध्यते॥ 12-20-8(72952)
अनर्हते यद्ददाति न ददाति यदर्हते।
अर्हानर्हापरिज्ञानाद्दानधर्मोऽपि दुष्करः॥ 12-20-9(72953)
यज्ञाय सृष्टानि धनानि धात्रा
यज्ञादिष्टः पुरुषो रक्षिता च।
तस्मात्सर्वं यज्ञ एवोपयोज्यं
धनं ततोऽनन्तर एव कामः॥ 12-20-10(72954)
यज्ञैरिन्द्रो विविधै रत्नवद्भि
र्देवान्सर्वानभ्ययाद्भूरितेजाः।
तेनेन्द्रत्वं प्राप्य विभ्राजतेऽसौ
तस्माद्यज्ञे सर्वमेवोपयोज्यम्॥ 12-20-11(72955)
महादेवः सर्वयज्ञे महात्मा
हुत्वाऽऽत्मानं देवदेवो बभूव।
विश्वाँल्लोकान्व्याप्य विष्टभ्य कीर्त्या
विराजते द्युतिमान्कृत्तिवासाः॥ 12-20-12(72956)
आविक्षितः पार्थिवोऽसौ मरुत्तो
वृद्ध्या शक्रं योऽजयद्देवराजम्।
यज्ञे यस्य श्रीः स्वयं सन्निविष्टा
यस्मिन्भाण्डं काञ्चनं सर्वमासीत्॥ 12-20-13(72957)
हरिश्चन्द्रः पार्थिवेन्द्रः श्रुतस्ते
यज्ञैरिष्ट्वा पुण्यभाग्वीतशोकः।
ऋद्ध्या शक्रं योऽजयन्मानुषः सं
स्तस्माद्यज्ञे सर्वमेवोपयोज्यम्॥ ॥ 12-20-14(72958)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि विंशोऽध्यायः॥ 20॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-20-1 वाक्यान्तरे वाक्यावसरे। अभिनीततरं युक्तिमत्तरम्॥ 12-20-4 चतुष्पदी चतुराश्रमी॥ 12-20-5 क्रमाद्ब्रह्मचारियतिगृहस्थवानप्रस्था इत्यर्थः॥ 12-20-7 धनं हेतुः कारणं यस्य तस्य यज्ञादेर्यज्ञाद्यर्थम् ईहेत धनं तस्यानीहैव गरीयसी। प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरमिति न्यायात्तमिमं परधर्मं यः क्षत्रिय उपाश्रयेत स दूष्येतेत्याह भूयानिति॥ 12-20-10 यज्ञार्थमेव आज्ञप्तो वेदेन॥ 12-20-13 भाण्डमुपकरणं पात्रादि॥


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